कोलंबस से 9 अगस्त तक : इतिहास किसका, कहानी किसकी?

                                            रूमा सेनगुप्ता 

                                       

      जिस ‘नई दुनिया’ को यूरोप ने खोजा, वहां सदियों से लोग रहते थे। इतिहास की इसी बहस से जन्मा एक सवाल—किसकी कहानी दुनिया के सामने आई और किसकी आवाज दब गई?

     इतिहास के पन्नों में कुछ तारीखें केवल तारीखें नहीं होतीं, वे सवाल बन जाती हैं। 9 अगस्त भी ऐसी ही एक तारीख है। विश्व जनजातीय दिवस के रूप में मनाया जाने वाला यह दिन दुनिया के जनजातीय समुदायों की पहचान, संस्कृति और अधिकारों की चर्चा का अवसर देता है। लेकिन इसके व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ को देखें तो एक बड़ा सवाल सामने आता है—इतिहास किसका है और कहानी किसकी?

1492 में क्रिस्टोफर कोलंबस अमेरिका पहुंचा। यूरोपीय इतिहास के एक बड़े हिस्से ने इसे ‘नई दुनिया की खोज’ के रूप में दर्ज किया। लेकिन जिस भूभाग को यूरोप ने नई दुनिया कहा, वह वहां सदियों से रहने वाले लोगों के लिए नई कैसे हो सकती थी? वहां समाज थे, भाषाएं थीं, संस्कृतियां थीं और प्रकृति के साथ जीवन की अपनी विशिष्ट पद्धतियां थीं।

     कोलंबस के आगमन के बाद अमेरिका में यूरोपीय उपनिवेशवाद का विस्तार हुआ। इसके परिणामस्वरूप वहां के मूल निवासियों को भूमि, जीवन और संस्कृति के स्तर पर भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। युद्ध, नई बीमारियां, जबरन विस्थापन और बदलती राजनीतिक नीतियों ने उनकी आबादी और सामाजिक संरचना को गहराई से प्रभावित किया।

       आज अमेरिका में मूल निवासी समुदायों की संख्या को लेकर भी अक्सर चर्चा होती है। सवाल उठता है कि जिस भूमि पर हजारों वर्षों से मूल निवासी समाज रहते थे, वहां उनकी जनसंख्या और प्रभाव आज सीमित क्यों दिखाई देता है? इसका उत्तर इतिहास की उन जटिल प्रक्रियाओं में छिपा है, जिनमें उपनिवेशवाद, संघर्ष, भूमि अधिग्रहण और सांस्कृतिक दबाव की लंबी कहानी शामिल है।

    अमेरिका में आज भी अनेक मूल निवासी समुदाय मौजूद हैं। वे अपनी भाषाओं, परंपराओं, कला, आध्यात्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक पहचान को बचाने के लिए प्रयासरत हैं। हालांकि उनके अधिकारों, शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक अवसरों और सामाजिक समानता को लेकर चुनौतियां आज भी बनी हुई हैं।

      यही कारण है कि अमेरिका में कोलंबस की विरासत को लेकर सवाल उठे और Columbus Day के विरोध तथा Indigenous Peoples’ Day की मांग जैसे आंदोलन सामने आए। सवाल यह था कि किसी बाहरी व्यक्ति के आगमन को ‘खोज’ कहने वाले इतिहास में उन लोगों की कहानी कहां है, जो उस भूमि पर पहले से रह रहे थे?

यहीं से इतिहास को नए नजरिए से देखने की जरूरत महसूस होती है।

      हालांकि एक तथ्य स्पष्ट है—9 अगस्त का विश्व जनजातीय दिवस कोलंबस की घटना के कारण घोषित हुआ, ऐसा कोई आधिकारिक प्रमाण नहीं है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 23 दिसंबर 1994 को प्रस्ताव 49/214 के माध्यम से 9 अगस्त को विश्व के जनजातीय लोगों का अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित किया। इसकी तारीख का आधार 9 अगस्त 1982 को जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र के जनजातीय जनसंख्या संबंधी कार्य समूह की पहली बैठक को माना गया है।

      लेकिन क्या इसे केवल एक संयोग मान लेना ही पर्याप्त है?

क्या यह महज संयोग नहीं कि एक ओर अमेरिका में कोलंबस की विरासत और मूल निवासियों के इतिहास को लेकर सवाल उठ रहे थे, वहीं दूसरी ओर विश्व स्तर पर जनजातीय समुदायों की पहचान, अधिकार और संस्कृति को मान्यता देने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ रही थी?

या फिर यह उस बड़े वैश्विक बदलाव का संकेत था, जिसमें इतिहास को केवल विजेताओं की दृष्टि से नहीं, बल्कि उन समाजों की दृष्टि से भी देखने की कोशिश शुरू हुई, जिनकी आवाज लंबे समय तक हाशिए पर रही?

      भारत का अनुभव इस सवाल का एक अलग उत्तर देता है।

भारत की जनजातीय संस्कृति को अमेरिका और यूरोप के औपनिवेशिक इतिहास के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। भारत का जनजातीय समाज अपनी विशिष्ट पहचान, परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के साथ भारतीय सभ्यता के व्यापक प्रवाह का अभिन्न हिस्सा रहा है। यहां जनजातीय संस्कृति किसी हाशिए की पहचान नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विविधता का समृद्ध स्वरूप है।

प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व भारत के जनजातीय जीवन की बड़ी विशेषता है। जंगल केवल संसाधन नहीं, जीवन का आधार हैं। नदियां केवल जलधारा नहीं, आस्था और संस्कृति का हिस्सा हैं। पहाड़ केवल भूगोल नहीं, लोकविश्वास और परंपराओं से जुड़े हैं।

        छत्तीसगढ़ में यह सांस्कृतिक विरासत और भी जीवंत दिखाई देती है। बस्तर के जंगलों से लेकर सरगुजा के पहाड़ों तक जनजातीय समाज के लोकगीत, लोकनृत्य, पर्व, कला, हस्तशिल्प और जीवन परंपराएं आज भी अपनी विशिष्ट पहचान के साथ जीवित हैं।

       इसलिए 9 अगस्त को भारत में केवल किसी वैश्विक विमर्श की प्रतिध्वनि के रूप में नहीं, बल्कि अपनी समृद्ध जनजातीय विरासत को समझने और सम्मान देने के अवसर के रूप में देखना चाहिए।

       कोलंबस से 9 अगस्त तक की यात्रा किसी एक घटना को दूसरी घटना से जोड़ने की कहानी नहीं, बल्कि इतिहास को नए नजरिए से देखने की यात्रा है।

      यह हमें बताती है कि जिसे कोई ‘खोज’ कहता है, वह किसी दूसरे के लिए उसके घर में किसी बाहरी का आगमन हो सकता है।

   इतिहास उन सभी का है, जिन्होंने उसे जिया है।

और कहानी उन सभी की है, जिनकी आवाज आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचनी चाहिए।

9 अगस्त इसी आवाज को सुनने, अपनी जनजातीय विरासत को समझने और इतिहास को अनेक दृष्टियों से देखने का अवसर है।

क्योंकि इतिहास का सबसे बड़ा न्याय यही है कि उसमें किसी की कहानी अनकही न रह जाए।

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