कैंसर इलाज में बड़ी वैज्ञानिक सफलता: ‘स्मार्ट’ दवा सिर्फ कैंसर कोशिकाओं में होगी सक्रिय, कीमोथेरेपी का विकल्प बनने की उम्मीद

नई दिल्ली, 20 अगस्त 2026। कैंसर के इलाज में एक ऐसी नई दवा विकसित की गई है, जो शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं को अपेक्षाकृत बचाते हुए मुख्य रूप से कैंसर कोशिकाओं के भीतर सक्रिय होने के लिए डिजाइन की गई है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अधीन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी इन साइंस एंड टेक्नोलॉजी (आईएएसएसटी) और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान गुवाहाटी के वैज्ञानिकों ने ‘आरके-251’ नामक इस स्मार्ट दवा उम्मीदवार को विकसित किया है। शोध के नतीजे अमेरिकन केमिकल सोसायटी के जर्नल ऑफ मेडिसिनल केमिस्ट्री में प्रकाशित हुए हैं।

इस शोध का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि आरके-251 को सामान्य कोशिकाओं में निष्क्रिय रहने और कैंसर कोशिकाओं के भीतर मौजूद एक खास जैव-रासायनिक वातावरण का फायदा उठाकर सक्रिय होने के लिए तैयार किया गया है। कैंसर कोशिकाओं में सामान्य कोशिकाओं की तुलना में अक्सर रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज यानी आरओएस का स्तर अधिक होता है। वैज्ञानिकों ने इसी अंतर को दवा को सक्रिय करने के लिए इस्तेमाल किया है।

आरके-251 वास्तव में एक ‘प्रोड्रग’ है। इसका अर्थ है कि दवा अपने शुरुआती रूप में पूरी तरह सक्रिय नहीं होती, बल्कि शरीर में एक विशेष परिस्थिति मिलने पर अपना प्रभावी औषधीय घटक मुक्त करती है। कैंसर कोशिका में मौजूद अधिक आरओएस आरके-251 को सक्रिय करते हैं और इसके बाद एनबीडीएचईएक्स नामक शक्तिशाली कैंसर-रोधी यौगिक मुक्त होता है। यह यौगिक जीएसटीपी1 नामक प्रोटीन को निशाना बनाता है। यह प्रोटीन कई कैंसर कोशिकाओं में अधिक मात्रा में पाया जाता है और कैंसर कोशिकाओं को कुछ दवाओं के प्रभाव से बचने में मदद कर सकता है।

शोधकर्ताओं ने विशेष रूप से ट्रिपल-नेगेटिव स्तन कैंसर की एमडीए-एमबी-231 कोशिकाओं पर आरके-251 का परीक्षण किया। प्रयोगशाला अध्ययनों में दवा ने कैंसर कोशिकाओं के खिलाफ प्रभावी गतिविधि दिखाई और गैर-कैंसरकारी कोशिकाओं की तुलना में इसकी चयनात्मकता भी देखी गई। वैज्ञानिकों के अनुसार यह परिणाम इस अवधारणा को मजबूती देता है कि कैंसर कोशिकाओं के भीतर मौजूद आरओएस को दवा सक्रिय करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

इस दवा की एक और खासियत इसका ‘टर्न-ऑन’ फ्लोरेसेंस प्रभाव है। आरओएस की मौजूदगी में आरके-251 सक्रिय होने के साथ निकट-अवरक्त क्षेत्र में फ्लोरेसेंस संकेत उत्पन्न करता है। इसका मतलब यह है कि भविष्य में ऐसी तकनीक दवा के सक्रिय होने की निगरानी में भी उपयोगी हो सकती है। विकसित हो रहे जेब्राफिश भ्रूणों में किए गए परीक्षणों में स्पष्ट तीव्र विषाक्तता या असामान्यताएं नहीं देखी गईं।

विशेषज्ञों के लिए यह शोध इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पारंपरिक कीमोथेरेपी की बड़ी चुनौती उसकी कम चयनात्मकता है। कई कीमोथेरेपी दवाएं कैंसर कोशिकाओं के साथ तेजी से विभाजित होने वाली स्वस्थ कोशिकाओं को भी प्रभावित कर सकती हैं, जिसके कारण विभिन्न दुष्प्रभाव सामने आते हैं। इसी वजह से आरओएस, पीएच, एंजाइम और अन्य ट्यूमर-विशिष्ट संकेतों के आधार पर सक्रिय होने वाली ‘स्मार्ट’ दवा प्रणालियां कैंसर अनुसंधान का महत्वपूर्ण क्षेत्र बन रही हैं।

हालांकि आरके-251 को अभी कैंसर के मरीजों के इलाज के लिए उपलब्ध दवा नहीं माना जा सकता। फिलहाल इसके परिणाम प्रीक्लिनिकल स्तर के हैं। मनुष्यों में इसकी प्रभावशीलता, सुरक्षा, उचित खुराक और संभावित दुष्प्रभावों का पता लगाने के लिए आगे व्यापक पशु अध्ययन और उसके बाद क्लिनिकल परीक्षण जरूरी होंगे। इसलिए इसे फिलहाल कीमोथेरेपी का तत्काल विकल्प नहीं, बल्कि भविष्य की लक्षित कैंसर चिकित्सा की दिशा में एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक कदम माना जाना चाहिए।

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