भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बढ़ती महंगाई और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच करीब साढ़े तीन वर्ष बाद नीतिगत रेपो दर में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी की है। बुधवार को घोषित द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा में मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने रेपो दर को 5.25 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत करने का निर्णय सर्वसम्मति से लिया। फरवरी 2023 के बाद यह पहली बार है जब RBI ने रेपो दर में बढ़ोतरी की है।
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मौद्रिक नीति की घोषणा करते हुए कहा कि यह निर्णय बदलती आर्थिक और वित्तीय परिस्थितियों तथा महंगाई के परिदृश्य के विस्तृत आकलन के बाद लिया गया है। केंद्रीय बैंक ने अपनी मौद्रिक नीति का रुख ‘न्यूट्रल’ से बदलकर ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ यानी संतुलित एवं क्रमिक सख्ती कर दिया है। चार सदस्यों ने नीति रुख में बदलाव के पक्ष में मतदान किया, जबकि दो सदस्य इसके पक्ष में नहीं थे।
RBI का यह कदम ऐसे समय आया है जब खुदरा महंगाई में लगातार दबाव दिखाई दे रहा है। अगस्त 2026 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित खुदरा महंगाई बढ़कर 4.82 प्रतिशत हो गई, जबकि जुलाई में यह 4.45 प्रतिशत थी। RBI के अनुसार खाद्य और ईंधन कीमतों में वृद्धि के साथ महंगाई का दबाव व्यापक हुआ है। आने वाले समय में महंगाई के और बढ़ने की आशंका को देखते हुए केंद्रीय बैंक ने मौद्रिक नीति के माध्यम से कीमतों को नियंत्रित करने पर जोर दिया है।
नई दरों के साथ स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी (SDF) की दर 5.25 प्रतिशत हो गई है, जबकि मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (MSF) और बैंक रेट 5.75 प्रतिशत पर पहुंच गए हैं। RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए महंगाई का अनुमान भी बढ़ाकर 5.2 प्रतिशत कर दिया है। केंद्रीय बैंक का अनुमान है कि अगले तीन तिमाहियों में औसत headline CPI inflation लगभग 5.8 प्रतिशत रह सकती है।
RBI ने स्पष्ट संकेत दिया है कि निकट अवधि में ब्याज दरों में कटौती की संभावना नहीं है। गवर्नर संजय मल्होत्रा के अनुसार मौजूदा परिस्थितियों में आगे की नीति कार्रवाई दर बढ़ाने या उसे यथास्थिति पर रखने तक सीमित रह सकती है। आगे की दिशा महंगाई, आर्थिक वृद्धि, आपूर्ति संबंधी झटकों और मांग की स्थिति पर निर्भर करेगी।
रेपो दर बढ़ने का सीधा असर बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों से लिए जाने वाले ऋण की लागत पर पड़ सकता है। होम लोन, वाहन ऋण और व्यक्तिगत ऋण की ब्याज दरों में बढ़ोतरी होने की संभावना है, जिससे मौजूदा फ्लोटिंग रेट ऋण लेने वाले ग्राहकों की EMI बढ़ सकती है। दूसरी ओर, बैंक जमा और सावधि जमा पर ब्याज दरों में भी बढ़ोतरी की संभावना बन सकती है।
वैश्विक स्तर पर पश्चिम एशिया में जारी तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, वैश्विक ब्याज दरों का दबाव और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी अनिश्चितताएं भी RBI के सामने महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं। इसके बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की घरेलू गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में भारत की अर्थव्यवस्था 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी है।

इस प्रकार RBI का ताजा निर्णय महंगाई को नियंत्रित करने और आर्थिक स्थिरता बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। आने वाले महीनों में महंगाई, कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के आधार पर केंद्रीय बैंक की अगली नीति दिशा तय होगी।
