बस्तर दशहरा में निभाया गया ऐतिहासिक बेल पूजा विधान, सरगीपाल से जुड़वां बेल फल ससम्मान लाए गए मां दंतेश्वरी मंदिर

राजपरिवार ने पारंपरिक विधि-विधान से की पूजा-अर्चना, सदियों पुरानी लोकमान्यता और आस्था का अनूठा संगम बना बेल जात्रा

जगदलपुर, 18 अक्टूबर 2026। विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा की समृद्ध परंपराओं के अंतर्गत रविवार को ऐतिहासिक बेल पूजा विधान संपन्न हुआ। इस अवसर पर बस्तर राजपरिवार के सदस्य और मुख्य पुजारी गाजे-बाजे के साथ राजमहल से निकलकर सरगीपाल गांव पहुंचे। गांव के ग्रामीणों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ उनका स्वागत किया। यहां विशेष बेल वृक्ष की पूजा-अर्चना की गई, जिस पर प्राकृतिक रूप से जोड़े में बेल फल लगते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इन जुड़वां बेल फलों को देवी स्वरूप मानकर मां दंतेश्वरी के मंदिर में ससम्मान लाया जाता है।

बस्तर दशहरा देश के विशिष्ट धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में शामिल है। लगभग 75 दिनों तक चलने वाले इस पर्व का प्रमुख केंद्र मां दंतेश्वरी की आराधना, स्थानीय देवी-देवताओं की परंपराएं और बस्तर की सांस्कृतिक विरासत है। यहां दशहरा उत्सव की पहचान रावण दहन के बजाय विशिष्ट पूजा-विधानों और सामुदायिक सहभागिता से है।

सरगीपाल के बेल वृक्ष से जुड़ी है अनूठी परंपरा

जगदलपुर शहर से लगभग पांच किलोमीटर दूर सरगीपाल गांव के जूनापारा में स्थित चबूतरे पर बेल के तीन वृक्ष हैं। इनमें एक वृक्ष अपनी विशिष्ट प्राकृतिक संरचना के कारण विशेष महत्व रखता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, इसी वृक्ष पर लगने वाले जोड़े के बेल फलों का उपयोग बस्तर दशहरा के बेल जात्रा पूजा विधान में किया जाता है।

बेल पूजा से पहले रात में मां दंतेश्वरी मंदिर के प्रधान पुजारी जूनापारा पहुंचकर विधि-विधान से जोड़े के बेल फलों की पूजा करते हैं। परंपरा के अनुसार, वृक्ष पर लाल रंग का पवित्र वस्त्र बांधकर देवी को दशहरा उत्सव में आने का निमंत्रण दिया जाता है। इसके बाद अगले दिन राजपरिवार के सदस्य गांव पहुंचते हैं और निर्धारित विधि से पूजा-अर्चना करते हैं।

देवी के मायके से विदाई जैसी भावपूर्ण परंपरा

स्थानीय मान्यता के अनुसार, जोड़े के बेल फलों को वृक्ष से उतारकर मां दंतेश्वरी मंदिर लाने की परंपरा भावनात्मक और धार्मिक महत्व रखती है। जब राजपरिवार के सदस्य बेल फलों को लेकर जगदलपुर की ओर प्रस्थान करते हैं, तो सरगीपाल के ग्रामीणों के बीच ऐसा भावपूर्ण वातावरण बनता है, मानो किसी बेटी को मायके से विदा किया जा रहा हो। इस दौरान हल्दी खेलने की परंपरा भी निभाई जाती है। ग्रामीण पारंपरिक वाद्ययंत्रों और बैंड-बाजे की धुन पर नाचते-गाते हुए इस यात्रा में सहभागी बनते हैं।

लोककथा में मां दंतेश्वरी और मां माणिकेश्वरी का उल्लेख

सरगीपाल के बुजुर्गों के अनुसार, बेल पूजा विधान के पीछे लगभग ढाई सौ वर्ष पुरानी लोककथा प्रचलित है। मान्यता है कि एक समय बस्तर के राजा शिकार करते हुए सरगीपाल के जंगलों में पहुंचे थे। वहां उन्होंने दो सुंदर कन्याओं को देखकर विवाह का प्रस्ताव रखा। अगले दिन जब राजा वहां पहुंचे, तो दोनों कन्याएं दुल्हन के वेश में दिखाई दीं। राजा को उनकी दिव्य शक्ति का अनुभव हुआ और उन्होंने क्षमा मांगते हुए उनका परिचय पूछा।

लोकमान्यता के अनुसार, दोनों कन्याओं ने स्वयं को राजा के कुल की देवियां मां दंतेश्वरी और मां माणिकेश्वरी बताया। राजा ने उनसे बस्तर दशहरा में पधारने की प्रार्थना की। इसके बाद दोनों देवियां बेल वृक्ष के नीचे अंतर्ध्यान हो गईं। तभी से जोड़े के बेल फलों को देवी स्वरूप मानकर मंदिर लाने की परंपरा चली आ रही है।

बेल पूजा विधान बस्तर की धार्मिक आस्था, राजपरिवार की परंपरा और ग्रामीण समाज की सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण है। पीढ़ियों से निभाई जा रही यह परंपरा बस्तर दशहरा को विशिष्ट पहचान प्रदान करती है और स्थानीय समुदायों की आस्था को एक सूत्र में जोड़ती है।

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