नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि पश्चिम से उत्पन्न एक लहर भारत सहित पूरी दुनिया में शालीनता, शुभता, संस्कृति और मानवता के मूल्यों को नष्ट करने का प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि तथाकथित विकसित देश भी इस प्रभाव का सामना कर रहे हैं और कई मामलों में स्वयं को असहाय महसूस कर रहे हैं। उन्होंने भारतीय समाज से अपनी सांस्कृतिक चेतना, नैतिक मूल्यों और राष्ट्रीय एकता को मजबूत बनाए रखने का आह्वान किया।
नागपुर के रेशिमबाग मैदान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वार्षिक विजयादशमी उत्सव को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि देश को कमजोर और विभाजित करने की कोशिश करने वाली ताकतें सुनियोजित रणनीतियों के साथ काम कर रही हैं। ऐसी परिस्थितियों में समाज को सजग रहते हुए अपनी सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय हितों के प्रति प्रतिबद्ध रहना आवश्यक है।
उन्होंने दुनिया के विभिन्न हिस्सों और भारत में हाल के समय में हुए जन आंदोलनों का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज और देश के कामकाज में योगदान देना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। यह दायित्व अपनेपन की भावना और इस विश्वास से उत्पन्न होता है कि राष्ट्र तथा समाज उसके अपने हैं। जन आंदोलनों को भी इसी भावना से प्रेरित होना चाहिए, ताकि वे समाज के व्यापक हित में सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बन सकें।
संघ प्रमुख ने आगाह किया कि जब जन आंदोलन अपने मूल उद्देश्य से भटककर राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के साधन बन जाते हैं अथवा किसी व्यक्ति, समूह या विचारधारा के प्रति शत्रुता से प्रेरित होने लगते हैं, तब देश को कमजोर करने की इच्छा रखने वाली ताकतों को परिस्थितियों का लाभ उठाने का अवसर मिल जाता है। इसलिए आंदोलनों में सामाजिक उत्तरदायित्व, विवेक और राष्ट्रहित की भावना बनाए रखना जरूरी है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि राष्ट्र का भविष्य केवल सरकारों या संस्थाओं के प्रयासों पर निर्भर नहीं करता, बल्कि नागरिकों के आचरण, सामाजिक सहभागिता और सामूहिक जिम्मेदारी से भी निर्धारित होता है। समाज में परस्पर विश्वास, सद्भाव और अपनेपन की भावना मजबूत होने से राष्ट्रीय जीवन को स्थिरता मिलती है। नागरिकों को अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों के प्रति भी सजग रहना चाहिए।
विजयादशमी के अवसर पर आयोजित समारोह की शुरुआत में मोहन भागवत ने शस्त्रपूजन किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में विजयादशमी का विशेष महत्व है। यह दिन संघ के स्थापना दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। इस अवसर पर स्वयंसेवक संगठन की परंपराओं के अनुरूप कार्यक्रमों में भाग लेते हैं और राष्ट्र तथा समाज के प्रति अपने दायित्वों को निभाने का संकल्प दोहराते हैं।

अपने संबोधन में भागवत ने सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा, सामाजिक जागरूकता और राष्ट्रीय एकता के महत्व को रेखांकित किया। उनका संदेश था कि समाज को किसी भी प्रकार के विभाजनकारी प्रयासों के प्रति सजग रहते हुए अपनेपन, जिम्मेदारी और राष्ट्रहित की भावना के आधार पर आगे बढ़ना चाहिए।
