12वां ब्रिक्स संसदीय सम्मेलन संयुक्त घोषणापत्र को सर्वसम्मति से अपनाए जाने के साथ आज सम्पन्न हो गया। घोषणा पत्र संसदीय सहयोग को और मजबूत करने की ब्रिक्स सदस्य देशों की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। साथ ही लचीलापन, नवाचार, सहयोग और निरंतरता के चार प्रमुख विषयों के अंतर्गत अपने साझा लक्ष्यों को आगे बढ़ाने पर बल देता है। दो दिवसीय मंच के आज दूसरे और अंतिम दिन लोकसभा अध्यक्ष और 12वें ब्रिक्स संसदीय मंच के अध्यक्ष ओम बिरला ने संयुक्त घोषणा पत्र सर्वसम्मति से अपनाए जाने का प्रस्ताव रखा। इसके बाद बिरला ने ब्रिक्स मंच 2027 की अध्यक्षता चीन को सौंप दी।
बिरला ने संविधान सदन के केंद्रीय कक्ष में अपने समापन भाषण में वैश्विक चुनौतियों से निपटने में देशों के बीच अधिक बातचीत, भरोसे और सहयोग का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि विचारों, पृष्ठभूमियों और चुनौतियों में भिन्नता होने के बावजूद ब्रिक्स देश मानव कल्याण, शांति और समृद्धि के प्रति वचनबद्ध हैं। उन्होंने हर देश की संप्रभुता का सम्मान करने, अंतरराष्ट्रीय विवादों का शांतिपूर्ण समाधान निकालने और सभी के लिए विकास के समान अवसर सुनिश्चित करने पर बल दिया।
लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि दो दिन के सम्मेलन के दौरान केवल मौजूदा चुनौतियों पर ही नहीं, बल्कि भविष्य में सहयोग के नए आयाम तलाशने पर भी बातचीत हुई। वैश्विक संघर्षों, क्षेत्रीय अस्थिरता और आर्थिक अनिश्चितता का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि बातचीत और सहयोग पहले से ज्यादा जरूरी हो गए हैं। उन्होंने कहा कि वैश्विक समस्याओं का दीर्घकालिक समाधान संघर्ष के बजाय बातचीत से, युद्ध के बजाय शांति से और प्रतिस्पर्धा के बजाय सहयोग से निकाला जा सकता है। उन्होंने कहा कि वैश्विक शांति से सभी, विशेषकर युवा पीढ़ी के बेहतर भविष्य के वादे के साथ सुरक्षा, गरिमा और न्याय की गारंटी होनी चाहिए।
बिरला ने कहा कि संयुक्त घोषणा पत्र के जरिए देशों ने संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों, आपसी सम्मान, अंदरूनी मामलों में दखल न देने और अंतरराष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के प्रति वचनबद्धता की पुष्टि की। उन्होंने कहा कि घोषणा पत्र में आतंकवाद के सभी रूपों की निंदा की गई। साथ ही आतंकवादियों और आतंकी गुटों से निपटने में समन्वित और ठोस कार्रवाई का आह्वान किया गया।

बिरला ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल पर जोर देते हुए कहा कि इसके अनुप्रयोग नैतिकता, पारदर्शिता और मानव कल्याण के सिद्धांतों के अनुरूप होने चाहिए। उन्होंने कहा कि वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में विकासशील और अल्पविकसित देशों की आकांक्षाओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
