सारंगढ़-बिलाईगढ़। विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर छत्तीसगढ़ के विभिन्न हिस्सों में आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपरा, पहचान और एकता का उत्साह देखने को मिला। इसी कड़ी में सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले में आयोजित कार्यक्रम में आदिवासी अस्मिता की गूंज सुनाई दी। गोंडवाना भवन से निकली भव्य रैली ने शहर के प्रमुख मार्गों से गुजरते हुए आदिवासी समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का संदेश दिया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में युवाओं, महिलाओं और बुजुर्गों ने भाग लेकर सामाजिक एकजुटता का परिचय दिया।
कार्यक्रम की शुरुआत गोंडवाना भवन में पारंपरिक पूजा-अर्चना के साथ हुई। समाज के लोगों ने अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को स्मरण करते हुए एकजुटता का संकल्प लिया। इसके बाद पारंपरिक वेशभूषा में सजे लोगों की मौजूदगी के बीच रैली निकाली गई। ढोल-नगाड़ों की थाप, लोकगीतों और पारंपरिक नृत्य ने पूरे वातावरण को उत्सवमय बना दिया।
रैली शहर के प्रमुख मार्गों से गुजरते हुए लोगों का ध्यान आकर्षित करती रही। इसमें आदिवासी समाज की विभिन्न परंपराओं और सांस्कृतिक प्रतीकों की झलक दिखाई दी। युवाओं की बड़ी भागीदारी ने आयोजन में नई ऊर्जा का संचार किया, वहीं महिलाओं और बुजुर्गों की उपस्थिति ने पीढ़ियों के बीच संस्कृति और परंपरा के निरंतर हस्तांतरण का संदेश दिया।
मंडी प्रांगण में दिखी छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता
रैली का समापन कृषि उपज मंडी प्रांगण में हुआ, जहां रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। कलाकारों ने लोकनृत्य और लोकगीतों के माध्यम से आदिवासी जीवनशैली, सामाजिक परंपराओं और प्रकृति के साथ उनके गहरे संबंध को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया। पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन और लोककलाओं की प्रस्तुति ने दर्शकों को आकर्षित किया।

विश्व आदिवासी दिवस का यह आयोजन केवल एक उत्सव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आदिवासी समाज की पहचान, अधिकार, संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण का संदेश भी देता नजर आया। छत्तीसगढ़ की सामाजिक संरचना में आदिवासी समाज की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। प्रदेश के बस्तर, सरगुजा, रायगढ़, जशपुर, कांकेर, कोंडागांव, नारायणपुर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, सुकमा सहित अनेक क्षेत्रों में आदिवासी समुदाय की समृद्ध लोकपरंपराएं और विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान देखने को मिलती है।
संस्कृति और प्रकृति से जुड़ी है आदिवासी पहचान
छत्तीसगढ़ की आदिवासी संस्कृति में प्रकृति, जल, जंगल और जमीन का विशेष महत्व है। लोकनृत्य, लोकगीत, पारंपरिक वेशभूषा, पर्व-त्योहार और सामुदायिक जीवन प्रदेश की सांस्कृतिक विविधता को समृद्ध बनाते हैं। विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों के माध्यम से इन परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने का संदेश दिया गया।

सारंगढ़-बिलाईगढ़ में आयोजित रैली और सांस्कृतिक कार्यक्रम ने भी यही संदेश दिया कि आधुनिकता के दौर में विकास के साथ अपनी जड़ों, भाषा, लोककला और परंपराओं को सुरक्षित रखना जरूरी है। आयोजन में उमड़ा उत्साह आदिवासी समाज की एकता, गौरव और अपनी सांस्कृतिक पहचान के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता रहा।
