‘भारत जीआई’ बैनर से देश के पारंपरिक उत्पादों को मिलेगा वैश्विक बाजार, एमएसएमई मंत्रालय और डीपीआईआईटी के बीच समझौता

नई दिल्ली, 11 अगस्त 2026। देश के पारंपरिक उत्पादों, कारीगरों और स्थानीय उद्यमियों को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ने की दिशा में केंद्र सरकार ने महत्वपूर्ण पहल की है। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय और वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (डीपीआईआईटी) ने भारत के भौगोलिक संकेत (जीआई) उत्पादों के व्यावसायीकरण और वैश्विक बाजार तक उनकी पहुंच बढ़ाने के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं।

यह समझौता 5 अगस्त 2026 को नई दिल्ली स्थित वाणिज्य भवन में हुआ। समझौते पर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय के निदेशक मोहम्मद सालिक परवेज और डीपीआईआईटी के आईपीआर प्रभाग के निदेशक करण थापर ने वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में हस्ताक्षर किए। इस सहयोग के साथ ‘भारत जीआई’ बैनर की शुरुआत भी की गई है, जिसके माध्यम से क्षेत्रीय जीआई उत्पादों को डिजिटल और सरकारी खरीद के बड़े बाजार से जोड़ने की योजना है।

जीआई उत्पादों को मिलेगा संगठित बाजार

भारत में भौगोलिक संकेतों के पंजीकरण और कानूनी संरक्षण के लिए डीपीआईआईटी नोडल विभाग है, जबकि एमएसएमई मंत्रालय देशभर के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों, पारंपरिक उद्योगों और कारीगरों के विकास तथा वित्तीय सुदृढ़ता के लिए प्रमुख भूमिका निभाता है।

सरकार का मानना है कि किसी उत्पाद को जीआई टैग मिलना उसकी क्षेत्रीय पहचान और विशिष्टता की कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित करता है, लेकिन केवल पंजीकरण से उसका आर्थिक मूल्य पूरी तरह सामने नहीं आता। इसके लिए उत्पादों की गुणवत्ता, उत्पादन क्षमता, ब्रांडिंग, पैकेजिंग, डिजिटल बिक्री और निर्यात क्षमता को मजबूत करना आवश्यक है। नए समझौते का उद्देश्य इसी दिशा में दोनों विभागों के प्रयासों को एक साथ लाना है।

ओएनडीसी और जीईएम से जुड़ेंगे जीआई उत्पाद

समझौते के तहत दोनों संगठन अपने कार्यक्रमों और योजनाओं में ‘एक जिला एक उत्पाद’ यानी ओडीओपी की अवधारणा को और अधिक प्रभावी ढंग से शामिल करने की दिशा में काम करेंगे। जीआई समूहों और अधिकृत उपयोगकर्ताओं को ‘भारत जीआई’ बैनर के अंतर्गत डिजिटल वाणिज्य के लिए ओपन नेटवर्क यानी ओएनडीसी और सरकारी ई-मार्केटप्लेस यानी जीईएम से जोड़ने में सहयोग किया जाएगा।

इससे स्थानीय कारीगरों, बुनकरों और उत्पादकों को अपने उत्पादों के लिए व्यापक बाजार उपलब्ध होने की उम्मीद है। डिजिटल मंचों से जुड़ने के बाद छोटे उत्पादक देश के विभिन्न हिस्सों के ग्राहकों तक सीधे पहुंच बना सकेंगे। सरकारी खरीद में भी जीआई उत्पादों की संभावनाएं बढ़ेंगी।

देश-विदेश में विशेष प्रदर्शनियों का आयोजन

जीआई उत्पादों के घरेलू और वैश्विक विपणन को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रदर्शनियों, खरीदार-विक्रेता बैठकों और अन्य प्रदर्शनियों में विशेष जीआई पवेलियन को सह-प्रायोजित करने की योजना है। इससे क्षेत्रीय उत्पादों को बड़े खरीदारों, वितरकों और अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ने में मदद मिलेगी।

विशेषज्ञों और उत्पादक समूहों के बीच संपर्क बढ़ने से जीआई उत्पादों की मांग, गुणवत्ता और बाजार की आवश्यकताओं को समझने का अवसर भी मिलेगा। इससे पारंपरिक उत्पादों को आधुनिक बाजार की जरूरतों के अनुरूप विकसित करने में सहायता मिल सकती है।

कारीगरों और बुनकरों की आजीविका को मिलेगा बल

इस पहल का सीधा लाभ देश के कारीगरों, बुनकरों और स्थानीय उत्पादक समूहों को मिलने की उम्मीद है। क्षमता निर्माण, डिजिटल सशक्तिकरण और बेहतर बाजार पहुंच के माध्यम से छोटे उद्यमों को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने पर जोर दिया जाएगा।

जीआई उत्पादों के व्यावसायीकरण से स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय के अवसर बढ़ सकते हैं। इससे पारंपरिक शिल्प और उत्पादन तकनीकों को संरक्षित रखने के साथ नई पीढ़ी को इनसे जोड़ने में भी मदद मिल सकती है।

आत्मनिर्भर भारत और वोकल फॉर लोकल को मिलेगा बल

एमएसएमई मंत्रालय और डीपीआईआईटी के बीच यह सहयोग बौद्धिक संपदा संरक्षण और उद्यम विकास के प्रयासों को एक साथ लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। जीआई उत्पादों को प्रीमियम घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ने से स्थानीय उत्पादों की ब्रांड वैल्यू बढ़ने की संभावना है।

सरकार का मानना है कि इस पहल से भारत की विविध सांस्कृतिक और पारंपरिक विरासत को आर्थिक अवसरों में बदला जा सकेगा। स्थानीय उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाने के साथ यह पहल ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ के दृष्टिकोण को भी मजबूत करेगी।

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