दुर्ग। दुर्ग जिले का धमधागढ़ अपने प्राचीन मंदिरों और ऐतिहासिक तालाबों के साथ समृद्ध जल विरासत के लिए भी जाना जाता है। रियासतकाल में विकसित की गई यहां की पारंपरिक जल प्रबंधन व्यवस्था आज भी शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। इसी प्राचीन जल विरासत को करीब से समझने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से धमधागढ़ में ‘पुरखौती विरासत यात्रा’ का आयोजन किया गया। यात्रा में प्रदेशभर से प्रोफेसर, शोधार्थी, व्याख्याता और पर्यटक शामिल हुए।

धर्मधाम गौरव गाथा समिति की ओर से आयोजित इस विरासत यात्रा के दौरान प्रतिभागियों ने धमधागढ़ के ऐतिहासिक तालाबों का भ्रमण किया और सदियों पुरानी पारंपरिक जल प्रबंधन व्यवस्था की जानकारी हासिल की। यात्रा के दौरान समिति के सदस्यों ने क्षेत्र में मौजूद करीब 126 तालाबों की श्रृंखला और इन तालाबों को आपस में जोड़ने वाली ऐतिहासिक ‘बूढ़ा नरवा’ व्यवस्था के बारे में विस्तार से बताया।
समिति के सदस्यों के अनुसार, बारिश के दौरान खेतों और आसपास के क्षेत्रों से आने वाले पानी को बूढ़ा नरवा के माध्यम से एकत्रित कर अलग-अलग तालाबों तक पहुंचाया जाता था। एक तालाब के भर जाने के बाद अतिरिक्त पानी दूसरे तालाब में पहुंचता था। इस तरह तालाबों की पूरी श्रृंखला एक-दूसरे से जुड़ी हुई थी। यह व्यवस्था बारिश के पानी को संरक्षित करने के साथ ही कृषि कार्यों के लिए भी बेहद उपयोगी साबित होती थी।
विरासत यात्रा के दौरान प्रतिभागियों ने इस पारंपरिक व्यवस्था को मौके पर जाकर समझा। उन्होंने तालाबों की संरचना, पानी के प्रवाह और पारंपरिक जल संरक्षण की तकनीकों का अवलोकन किया। प्रतिभागियों ने माना कि सीमित संसाधनों के बावजूद पुराने समय में स्थानीय लोगों ने जल संरक्षण और उसके उपयोग के लिए बेहद प्रभावी व्यवस्था विकसित की थी।
धर्मधाम गौरव गाथा समिति के संयोजक गोविंद पटेल ने बताया कि ‘पुरखौती विरासत यात्रा’ का उद्देश्य केवल ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण कराना नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को उस पारंपरिक जल संरक्षण व्यवस्था से परिचित कराना भी है, जिसने सदियों तक स्थानीय लोगों की जल जरूरतों को पूरा किया। उन्होंने कहा कि धमधागढ़ की जल विरासत में स्थानीय ज्ञान, अनुभव और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग की झलक मिलती है।

यात्रा में शामिल प्रोफेसर, व्याख्याता और शोधार्थियों ने धमधागढ़ की प्राचीन जल प्रबंधन व्यवस्था की सराहना की। उन्होंने कहा कि आधुनिक दौर में जल संरक्षण एक बड़ी चुनौती बन चुका है। ऐसे समय में सदियों पुरानी यह व्यवस्था समाज को वर्षा जल के संरक्षण, पानी के बेहतर उपयोग और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित प्रबंधन का महत्वपूर्ण संदेश देती है।
पर्यटकों ने भी विरासत यात्रा को ज्ञानवर्धक और रोचक अनुभव बताया। उनका कहना था कि ऐतिहासिक स्थलों को केवल देखने के बजाय उनके पीछे छिपे पारंपरिक ज्ञान और वैज्ञानिक सोच को समझने का अवसर मिलना इस यात्रा की खासियत है।

धमधागढ़ की यह पुरातन जल व्यवस्था इस बात का प्रमाण है कि जल संरक्षण की सोच आधुनिक नहीं, बल्कि भारतीय पारंपरिक जीवन पद्धति का अभिन्न हिस्सा रही है। जरूरत है कि ऐसी ऐतिहासिक व्यवस्थाओं का संरक्षण किया जाए, उनका दस्तावेजीकरण हो और उनके वैज्ञानिक महत्व को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए।
