नई दिल्ली। भारत में चीता संरक्षण कार्यक्रम के चार वर्ष पूरे होने के साथ देश में चीतों की संख्या 52 तक पहुंच गई है। 17 सितंबर 2022 को नामीबिया से आठ चीतों को भारत लाकर शुरू किए गए पुनर्वास अभियान ने अब प्रजनन और प्राकृतिक आवास में चीतों की अगली पीढ़ी तैयार करने के चरण में प्रवेश कर लिया है। परियोजना के तहत दक्षिण अफ्रीका और बाद में बोत्सवाना से भी चीते भारत लाए गए। सरकार के अनुसार, यह बड़े मांसाहारी वन्यजीव के अंतरमहाद्वीपीय पुनर्वास का दुनिया का पहला प्रयास था।
परियोजना की शुरुआत मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान से हुई थी। फरवरी 2023 में दक्षिण अफ्रीका से चीतों का दूसरा समूह भारत पहुंचा। इसके बाद फरवरी 2026 में बोत्सवाना से नौ और चीते लाए गए, जिनमें छह मादा और तीन नर शामिल थे। इन्हें कूनो में क्वारंटीन और अनुकूलन प्रक्रिया से गुजारने के बाद चरणबद्ध तरीके से बड़े क्षेत्र में छोड़े जाने की व्यवस्था की गई।
चीता संरक्षण कार्यक्रम की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में भारत में चीतों का सफल प्रजनन शामिल है। मार्च 2026 में नामीबिया से आई मादा चीता ज्वाला ने पांच शावकों को जन्म दिया था, जिससे उस समय भारत में जन्मे जीवित शावकों की संख्या 33 और देश में कुल चीतों की संख्या 53 हो गई थी। इसके बाद आबादी में प्राकृतिक बदलाव के साथ वर्तमान समीक्षा में संख्या 52 दर्ज की गई है।
परियोजना के लिए एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि अप्रैल 2026 में सामने आई, जब भारत में जन्मी मादा चीता ने कूनो राष्ट्रीय उद्यान के जंगल में चार शावकों को जन्म दिया। यह पुनर्वास कार्यक्रम के दौरान भारतीय धरती पर जन्मी मादा द्वारा प्राकृतिक परिस्थितियों में शावकों को जन्म देने का पहला दर्ज मामला था। इससे यह संकेत मिला कि भारत में जन्मे चीते भी प्राकृतिक वातावरण में प्रजनन करने में सक्षम हो रहे हैं।
चीता संरक्षण का दायरा अब कूनो से आगे बढ़कर गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य तक पहुंच चुका है। केंद्र सरकार के अनुसार, कूनो और गांधी सागर को मिलाकर चीतों के लिए संरक्षित आवास क्षेत्र लगभग 3,428 वर्ग किलोमीटर तक विस्तारित किया गया है। भविष्य में गुजरात के बन्नी घासभूमि क्षेत्र और मध्य प्रदेश के नौरादेही वन्यजीव अभयारण्य को भी चीतों के संभावित नए आवास के रूप में विकसित करने की योजना है।
परियोजना का उद्देश्य केवल चीतों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि भारत में एक ऐसी स्थायी आबादी तैयार करना है जो प्राकृतिक रूप से प्रजनन कर सके और विभिन्न सुरक्षित वन क्षेत्रों के बीच विकसित हो सके। इसके लिए पर्याप्त शिकार आधार, घासभूमि और खुले वन क्षेत्र तथा सुरक्षित आवागमन के लिए पारिस्थितिक संपर्क को महत्वपूर्ण माना गया है। दिसंबर 2025 में सरकार ने 2032 तक कूनो-गांधी सागर परिदृश्य में 60-70 चीतों की स्वावलंबी आबादी स्थापित करने का लक्ष्य बताया था।

चीता वर्ष 1952 में भारत से विलुप्त घोषित हो गया था। करीब सात दशक बाद सितंबर 2022 में इसके पुनर्वास की शुरुआत हुई। चार वर्षों में भारत में जन्मे शावकों और अफ्रीकी देशों से लाए गए चीतों के माध्यम से कार्यक्रम ने एक नई आबादी विकसित करने की दिशा में प्रगति की है। अब इसके अगले चरण में चीतों के दीर्घकालिक अस्तित्व, प्रजनन और विभिन्न प्राकृतिक आवासों में आबादी के विस्तार पर जोर रहेगा।
