जगदलपुर, 24 सितंबर 2026। विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक बस्तर दशहरा पर्व के तहत आज गुरुवार को जगदलपुर स्थित सिरहासार भवन में महत्वपूर्ण डेरी गड़ाई रस्म पारंपरिक विधि-विधान के साथ संपन्न होगी। 75 दिनों तक चलने वाले बस्तर दशहरा पर्व में डेरी गड़ाई को प्रमुख पूजा विधानों में माना जाता है। इस रस्म के साथ दशहरा के विशाल मांगलिक मंडप की आधार प्रक्रिया आगे बढ़ती है और रथ निर्माण की तैयारियों को भी गति मिलती है।
परंपरा के अनुसार बस्तर जिले के बिलोरी क्षेत्र से साल वृक्ष की विशेष लकड़ियां लाई जाएंगी। इन काष्ठ स्तंभों की सिरहासार में विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद निर्धारित स्थानों पर स्थापना की जाएगी। इसी पारंपरिक विधान को डेरी गड़ाई कहा जाता है। बस्तर दशहरा की परंपराओं में इसका विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार डेरी गड़ाई की परंपरा कई शताब्दियों पुरानी मानी जाती है।

डेरी गड़ाई रस्म के साथ ही बस्तर दशहरा के विशाल रथ के निर्माण की प्रक्रिया को औपचारिक गति मिलती है। बस्तर दशहरा में रथ निर्माण और उसके बाद होने वाली रथ परिक्रमा इस पर्व की विशिष्ट परंपराओं में शामिल हैं। रथ का निर्माण स्थानीय पारंपरिक कारीगरों और विभिन्न सामाजिक समूहों की सहभागिता से निर्धारित परंपरागत विधियों के अनुसार किया जाता है। बस्तर दशहरा समिति के कार्यक्रम के अनुसार 24 सितंबर के डेरी गड़ाई विधान के बाद अक्टूबर में पर्व के प्रमुख पूजा विधान प्रारंभ होंगे।
डेरी स्थापना के बाद परंपरा के अनुसार मेम्बर-मेम्बरीन और अन्य पारंपरिक सहभागी हल्दी खेलते हैं। यह आयोजन बस्तर दशहरा के धार्मिक विधान के साथ लोक उत्सव की आत्मीयता और उल्लास को भी अभिव्यक्त करता है। इस अवसर पर विभिन्न परगनों से मांझी, चालकी, सिरहा, गुनिया, पुजारी और दशहरा से जुड़े पारंपरिक पदाधिकारी एवं सेवक उपस्थित रहते हैं।
इस वर्ष बस्तर दशहरा का शुभारंभ 12 अगस्त को मां दंतेश्वरी मंदिर परिसर में पाट जात्रा पूजा विधान के साथ हुआ था। पाट जात्रा में रथ निर्माण से संबंधित पारंपरिक औजारों और काष्ठ की पूजा की गई थी। इसके बाद 24 सितंबर को डेरी गड़ाई का विधान निर्धारित किया गया है।
डेरी गड़ाई के बाद 10 अक्टूबर को काछनगादी, 11 अक्टूबर को कलश स्थापना और 12 अक्टूबर को जोगी बिठाई का विधान होगा। 13 से 18 अक्टूबर तक नवरात्रि पूजा एवं रथ परिक्रमा के विभिन्न विधान होंगे। 19 अक्टूबर को महाअष्टमी और निशा जात्रा, 20 अक्टूबर को मावली परघाव, 21 अक्टूबर को भीतर रैनी तथा 22 अक्टूबर को बाहर रैनी का आयोजन निर्धारित है। 23 अक्टूबर को काछन जात्रा और मुरिया दरबार होगा, जबकि 24 अक्टूबर को कुटुम्ब जात्रा तथा 27 अक्टूबर को मावली माता की डोली की विदाई के साथ इस वर्ष के पर्व का समापन होगा।
बस्तर दशहरा की विशिष्टता यह है कि यह सामान्य दशहरा पर्व की तरह केवल विजयादशमी और रावण वध तक सीमित नहीं है। जिला प्रशासन के अनुसार इसका संबंध बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी और यहां की विशिष्ट लोक-धार्मिक परंपराओं से है तथा यह पर्व लगभग 75 दिनों तक चलता है। विभिन्न पूजा विधान, रथ निर्माण, रथ परिक्रमा और पारंपरिक अनुष्ठान इसे देश के विशिष्ट सांस्कृतिक पर्वों में स्थान देते हैं।

जिला प्रशासन ने भी पर्व की तैयारियों को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है। कलेक्टर और एसपी ने हाल ही में सिरहासार सहित दशहरा से जुड़े प्रमुख स्थलों का निरीक्षण कर साफ-सफाई, सुरक्षा, यातायात और श्रद्धालुओं तथा रस्म में शामिल होने वाले लोगों की सुविधाओं की समीक्षा की। संबंधित विभागों को आपसी समन्वय के साथ व्यवस्थाएं समय पर पूर्ण करने के निर्देश दिए गए हैं।
