जनजातीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और प्रलेखन के लिए जनजातीय कार्य मंत्रालय और आईजीएनसीए के बीच समझौता

नई दिल्ली, 29 सितंबर 2026। भारत की समृद्ध और विविध जनजातीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, प्रलेखन, डिजिटलीकरण, अनुसंधान और व्यापक प्रचार-प्रसार को नई दिशा देने के लिए जनजातीय कार्य मंत्रालय और संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत स्वायत्त न्यास इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं। यह समझौता 28 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में हुआ। इसके माध्यम से देश की जनजातीय सांस्कृतिक परंपराओं को व्यवस्थित रूप से संरक्षित करने और उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर सामने लाने के लिए दोनों संस्थान मिलकर कार्य करेंगे।

समझौते के अवसर पर जनजातीय कार्य मंत्रालय की सचिव रंजना चोपड़ा तथा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। आईजीएनसीए की ओर से विभागाध्यक्ष डॉ. के. अनिल कुमार सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे। मंत्रालय के जनजातीय अनुसंधान के लिए विकसित संस्थागत परिवेश और जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (टीआरआई) के नेटवर्क को आईजीएनसीए की शैक्षणिक, अभिलेखीय, अनुसंधान और क्यूरेटोरियल विशेषज्ञता से जोड़ा जाएगा। मंत्रालय की वेबसाइट पर भी जनजातीय अनुसंधान संस्थानों से संबंधित गतिविधियों और बैठकों का विवरण उपलब्ध है।

समझौता ज्ञापन का प्रमुख उद्देश्य भारत की मूर्त और अमूर्त जनजातीय सांस्कृतिक विरासत के व्यवस्थित संरक्षण, दस्तावेजीकरण, डिजिटलीकरण, अनुसंधान और संवर्धन के लिए संस्थागत ढांचा तैयार करना है। इसके तहत जनजातीय कला, संगीत, पारंपरिक वाद्ययंत्र, भाषाएं, वाचिक परंपराएं, लोककथाएं, शिल्पकला, पारंपरिक रीति-रिवाज, व्यंजन और समुदायों के पारंपरिक ज्ञान का प्रलेखन किया जाएगा। इन सामग्रियों को डिजिटल माध्यमों से संरक्षित करने के साथ उनके अध्ययन और व्यापक प्रसार की दिशा में भी काम होगा।

इस पहल का एक महत्वपूर्ण पक्ष उन जनजातीय सांस्कृतिक परंपराओं की पहचान और संरक्षण होगा, जिनके लुप्त होने का खतरा है। विशेष रूप से लुप्तप्राय भाषाओं, वाचिक परंपराओं, लोककथाओं, स्वदेशी कला रूपों और पारंपरिक ज्ञान को दर्ज करने पर ध्यान दिया जाएगा। इसके लिए अभिलेखीय सामग्री, शोध और डिजिटल संसाधनों का उपयोग किया जाएगा, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए इन परंपराओं का प्रमाणिक सांस्कृतिक रिकॉर्ड उपलब्ध रहे।

साझेदारी के तहत जनजातीय कला और कलाकृतियों को प्रदर्शित करने वाली समर्पित दीर्घाओं तथा डिजिटल संग्रहालयों के विकास की भी योजना है। इनमें भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय समुदायों के योगदान को विशेष रूप से प्रदर्शित किया जा सकता है। डिजिटल अभिलेखागार और अत्याधुनिक इंटरैक्टिव संग्रहालय दीर्घाएं इस प्रयास को आधुनिक तकनीक से जोड़ेंगी, जिससे देश-विदेश के लोग जनजातीय सांस्कृतिक विरासत को डिजिटल माध्यम से भी देख और समझ सकेंगे।

समझौते के अंतर्गत शैक्षणिक संस्थानों और अन्य शिक्षण केंद्रों में युवा शिविरों के आयोजन की भी परिकल्पना की गई है। इन शिविरों के माध्यम से जनजातीय सांस्कृतिक मूल्यों, परंपराओं, संरक्षण की दीर्घकालिक पद्धतियों और भारत की सांस्कृतिक विविधता के प्रति युवाओं में जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा।

जनजातीय कार्य मंत्रालय के उप सचिव गणेश नागराजन ने कहा कि यह समझौता भारत की विविध जनजातीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और संवर्धन के लिए दोनों संस्थानों की क्षमताओं को एक साथ लाने का महत्वपूर्ण संस्थागत आधार उपलब्ध कराता है। वहीं आईजीएनसीए के विभागाध्यक्ष डॉ. के. अनिल कुमार ने कहा कि यह सहयोग डिजिटल अभिलेखागार और इंटरैक्टिव जनजातीय संग्रहालय दीर्घाओं के निर्माण में भी सहायता करेगा।

यह साझेदारी प्रदर्शनियों, संग्रहालयों, प्रकाशनों, डिजिटल मंचों, सांस्कृतिक उत्सवों और ज्ञान साझा करने की पहलों के माध्यम से जनजातीय सांस्कृतिक विरासत को व्यापक मंच प्रदान करेगी। इसके साथ ही जनजातीय विद्वानों, कलाकारों, शिल्पकारों और पारंपरिक ज्ञान के संवाहकों को राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी विरासत प्रस्तुत करने के अधिक अवसर मिलेंगे। इस प्रकार समझौता भारत की सांस्कृतिक विविधता को संरक्षित करने के साथ जनजातीय समुदायों की कला, परंपराओं और ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण संस्थागत प्रयास के रूप में सामने आया है।

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