राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु 12वें राष्ट्रीय हथकरघा दिवस समारोह में शामिल हुईं, संत कबीर और राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार प्रदान किए

नई दिल्ली, 8 अगस्त 2026। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु आज राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र, नई दिल्ली में आयोजित 12वें राष्ट्रीय हथकरघा दिवस समारोह में शामिल हुईं। इस अवसर पर उन्होंने संत कबीर हथकरघा पुरस्कार और राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार 2025 प्रदान किए। समारोह के दौरान भारत की समृद्ध और विविध हथकरघा बुनाई परंपराओं के सम्मान में चार स्मारक डाक टिकट भी जारी किए गए।

समारोह को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि हथकरघा सदियों से भारत की सभ्यता की विकास यात्रा का अभिन्न अंग रहा है। इसमें देश की असाधारण विविधता दिखाई देती है और इसने विभिन्न क्षेत्रों की विशिष्ट परंपराओं को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हथकरघा क्षेत्र रोजगार, महिला सशक्तीकरण, कला-संस्कृति और प्रकृति के प्रति सम्मान को बढ़ावा देता है। यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम और आत्मनिर्भरता की भावना से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।

राष्ट्रपति ने कहा कि 7 अगस्त 1905 को स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत हुई थी। बंगाल विभाजन के विरोध में शुरू हुए इस आंदोलन का उद्देश्य स्वदेशी वस्तुओं, स्वदेशी उद्योगों और विशेष रूप से देश के हथकरघा बुनकरों को प्रोत्साहन देना था। इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में भारत सरकार वर्ष 2015 से 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के रूप में मनाती आ रही है। उन्होंने राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर हथकरघा क्षेत्र से जुड़े सभी लोगों को बधाई दी और कहा कि यह आयोजन भारत की विविधता के साथ-साथ सांस्कृतिक एकात्मता का भी उत्सव है।

राष्ट्रपति ने कहा कि भारतीय हथकरघा क्षेत्र के ग्रामीण अर्थव्यवस्था के एक प्रमुख और मानव-केंद्रित क्षेत्र के रूप में विकसित होने की संभावनाएं मजबूत हुई हैं। महत्वपूर्ण हथकरघा क्लस्टरों को आधुनिक प्रौद्योगिकी और आधुनिक प्रशिक्षण विधियों से जोड़ा जा रहा है। सरकार बुनकरों की आय बढ़ाने के लिए अनेक कदम उठा रही है। उन्होंने कहा कि इन प्रयासों से भारतीय हथकरघा क्षेत्र की अंतरराष्ट्रीय छवि मजबूत हो रही है और यह क्षेत्र एक प्रमाणित सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था के रूप में उभर रहा है।

उन्होंने कहा कि तकनीक और नवाचारी डिजाइनों के साथ अनेक प्रतिभाशाली युवा उद्यमी हथकरघा क्षेत्र से जुड़ रहे हैं। सरकारी योजनाओं और संस्थानों के माध्यम से युवाओं को सक्रिय सहयोग और मार्गदर्शन दिया जाना चाहिए, ताकि उनके उत्साह और कौशल का उपयोग क्षेत्र की दीर्घकालिक सफलता के लिए किया जा सके। युवा उद्यमी, डिजाइनर और स्टार्टअप पारंपरिक शिल्प को आधुनिक रुझानों, ब्रांडों और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं से जोड़कर नए अवसर पैदा कर सकते हैं।

राष्ट्रपति ने भारतीय हथकरघा प्रौद्योगिकी संस्थानों और बुनकर सेवा केंद्रों के तत्वावधान में संचालित डिजाइन संसाधन केंद्रों की भूमिका की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि ये केंद्र युवाओं को हथकरघा क्षेत्र से जोड़ने और नई डिजाइन तथा तकनीकी क्षमताओं के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

राष्ट्रपति ने कहा कि हथकरघा क्षेत्र के सतत विकास के लिए नई प्रौद्योगिकियों का उचित उपयोग आवश्यक है। आधुनिक डिजिटल समाधानों के माध्यम से बाजार तक पहुंच को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के जरिए भारतीय हथकरघा उत्पादों की पहुंच वैश्विक बाजारों तक और अधिक मजबूत की जा सकती है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि हथकरघा क्षेत्र देश के समावेशी विकास और आत्मनिर्भरता का सशक्त आधार बनेगा।

संत कबीर हथकरघा पुरस्कार हथकरघा बुनकरों को प्रदान किया जाने वाला देश का सर्वोच्च सम्मान है। यह पुरस्कार उत्कृष्ट कारीगरी, हथकरघा के प्रति समर्पित जीवन तथा भारत की बुनाई परंपराओं को संरक्षित और समृद्ध करने में निरंतर योगदान के लिए प्रदान किया जाता है।

राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार उन बुनकरों और अन्य हितधारकों को प्रदान किया जाता है, जिन्होंने पारंपरिक कौशल के संरक्षण के साथ आधुनिक तकनीकों को अपनाते हुए असाधारण रचनात्मकता, गुणवत्ता, नवीनता और उत्कृष्टता का प्रदर्शन किया है। समारोह में इन पुरस्कारों के माध्यम से देश की समृद्ध हथकरघा परंपरा को आगे बढ़ाने वाले बुनकरों और कारीगरों के योगदान का सम्मान किया गया।

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