रायपुर, 10 अगस्त 2026। पंडित जवाहरलाल नेहरू स्मृति चिकित्सालय से संबद्ध डॉ. भीमराव अम्बेडकर स्मृति चिकित्सालय, रायपुर के हार्ट-चेस्ट एवं वैस्कुलर सर्जरी विभाग ने फेफड़ों की जटिल सर्जरी के क्षेत्र में एक नया कीर्तिमान स्थापित करते हुए मात्र 20 दिनों में 9 तथा पिछले दो महीनों में कुल 13 लोबेक्टॉमी (फेफड़े के संक्रमित हिस्से को निकालने की सर्जरी) सफलतापूर्वक कर मरीजों को नया जीवन दिया है। इनमें दो आपातकालीन सर्जरी ऐसे मरीजों की की गई, जिन्हें खांसी के साथ अत्यधिक रक्तस्राव (हेमोप्टाइसिस) हो रहा था। आधुनिक तकनीक और एडवांस्ड लंग स्टेपलर की सहायता से की गई इन जटिल सर्जरियों ने संस्थान की विशेषज्ञता को साबित किया है।
इन सर्जरियों में 15 साल के बच्चे की लोबेक्टॉमी भी शामिल है। बच्चे के बाएं फेफड़े के ऊपरी लोब में एस्परजिलोमा नामक फंगस का संक्रमण था। यह अब तक इस संस्थान में फेफड़े की लोबेक्टॉमी सर्जरी कराने वाला सबसे कम उम्र का मरीज है। इन ऑपरेशन में शामिल मरीजों की उम्र 15 से 70 वर्ष तक रही।
हार्ट-चेस्ट एवं वैस्कुलर सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. कृष्णकांत साहू के अनुसार, फेफड़े की लोबेक्टॉमी में मरीज के क्षतिग्रस्त फेफड़े के एक हिस्से को निकाल दिया जाता है। यह अत्यंत जटिल सर्जरी है, जिसे संस्थान में अत्याधुनिक तकनीक से किया जाता है। इसमें एडवांस्ड लंग स्टेपलर का उपयोग किया जाता है, जिससे भविष्य में होने वाली जटिलताओं, जैसे ब्रोन्कोप्लूरल फिस्टुला, की संभावना काफी कम हो जाती है।
छत्तीसगढ़ के किसी भी निजी या सरकारी संस्थान की तुलना में इतने कम समय में इतनी अधिक लोबेक्टॉमी सर्जरी किया जाना संस्थान के लिए एक कीर्तिमान और छत्तीसगढ़ के लिए गौरव की बात है।

छत्तीसगढ़ में फेफड़े की लोबेक्टॉमी सर्जरी के प्रमुख कारणों में एस्परजिलोमा और ब्रोन्किएक्टैसिस शामिल हैं। एस्परजिलोमा एक फंगस संक्रमण है, जो विशेषकर ऐसे मरीजों में हो सकता है, जिनके फेफड़े पहले टीबी से प्रभावित रहे हों या जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो। ब्रोन्किएक्टैसिस भी टीबी संक्रमण के बाद होने वाली सामान्य बीमारी है, जिसमें फेफड़े के अंदर छोटी-छोटी गुहाएं बन सकती हैं और संक्रमण के कारण खांसी के साथ खून आ सकता है।
वैस्कुलर मालफॉर्मेशन, लंग एब्सिस और फेफड़े का कैंसर भी खून आने का कारण हो सकते हैं। यदि फेफड़े का कैंसर प्रारंभिक अवस्था में हो और एक लोब तक सीमित हो, तो लोबेक्टॉमी के माध्यम से प्रभावित हिस्से को निकालकर उपचार किया जा सकता है।
पूरे छत्तीसगढ़ में फेफड़ों की सर्वाधिक सर्जरी इसी हार्ट, चेस्ट और वैस्कुलर सर्जरी विभाग में होती है। इनमें फेफड़े का डिकॉर्टिकेशन, लोबेक्टॉमी, सेगमेंटेक्टॉमी और न्यूमोनेक्टॉमी जैसी जटिल सर्जरियां शामिल हैं। न्यूमोनेक्टॉमी में दाएं या बाएं फेफड़े को पूर्णतः निकाल दिया जाता है।
सामान्यतः इस संस्थान में एक वर्ष में 15 से 20 लोबेक्टॉमी सर्जरी होती हैं। यहां छत्तीसगढ़ के अलावा बिहार, झारखंड, ओडिशा, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश से भी मरीज फेफड़ों की सर्जरी कराने पहुंचते हैं। सभी ऑपरेशन आयुष्मान योजना के तहत निशुल्क किए जाते हैं। विभाग में अभी भी लोबेक्टॉमी सर्जरी के लिए कुछ मरीज प्रतीक्षारत हैं।

क्या होती है लोबेक्टॉमी सर्जरी
हमारे शरीर में दो फेफड़े होते हैं। बायां फेफड़ा दो लोब यानी अपर लोब और लोअर लोब से बना होता है, जबकि दाएं फेफड़े में तीन लोब होते हैं—अपर लोब, मिडिल लोब और लोअर लोब।
यदि फेफड़े की कोई बीमारी जैसे एस्परजिलोमा, ब्रोन्किएक्टैसिस या लंग ट्यूमर किसी एक लोब तक सीमित हो, तो उस प्रभावित हिस्से को ऑपरेशन द्वारा निकाल दिया जाता है। इसे मेडिकल भाषा में लोबेक्टॉमी कहा जाता है। इसमें छाती में चीरा लगाकर संक्रमित लोब को फेफड़े के अन्य हिस्सों से अलग किया जाता है और विशेष तकनीक एवं लंग स्टेपलर की सहायता से उसे निकाला जाता है। आधुनिक स्टेपलर के प्रयोग से ऑपरेशन के बाद होने वाली जटिलताओं, जैसे ब्रोन्कोप्लूरल फिस्टुला, की संभावना कम हो जाती है। सामान्यतः 6 से 8 दिनों बाद मरीजों को अस्पताल से छुट्टी दे दी जाती है।
