नई दिल्ली, 4 अक्टूबर 2026। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने कहा है कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला का लचीलापन और संपर्क सुविधा उभरती तथा मध्यम स्तर की शक्तियों के लिए महत्वपूर्ण एजेंडा बन गए हैं। 62वें म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में बोलते हुए उन्होंने कहा कि ग्लोबल साउथ और ग्लोबल नॉर्थ से आने वाले इन देशों के हितों में कई समानताएं हैं और वे अपने प्रभाव तथा प्रासंगिकता को बढ़ाने के लिए एजेंडा आधारित सहयोग को आगे बढ़ा रहे हैं।
डॉ. जयशंकर ने कहा कि दुनिया तेजी से बदल रही है और इसके साथ वैश्विक एजेंडा तथा शक्ति-संतुलन भी बदल रहा है। अमेरिका की बदलती वैश्विक स्थिति, चीन का बढ़ता प्रभाव और देशों के बीच गहरी परस्पर निर्भरता ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों के सामने नई परिस्थितियां पैदा की हैं। ऐसे माहौल में उभरती और मध्यम शक्तियां जोखिम कम करने, साझेदारियों में विविधता लाने और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता मजबूत करने पर जोर दे रही हैं।
विदेश मंत्री ने कहा कि इन देशों के लिए हर मुद्दे पर एक जैसी राय होना जरूरी नहीं है। साझा हित के पर्याप्त क्षेत्र होने पर देश व्यावहारिक सहयोग के नए रास्ते बना सकते हैं। उन्होंने कहा कि आज कई देश अलग-अलग विषयों पर अलग-अलग समूहों के साथ सहयोग कर रहे हैं। यह लचीला और मुद्दा आधारित सहयोग वैश्विक व्यवस्था के नए स्वरूप को आकार दे रहा है।
डॉ. जयशंकर ने क्वाड का उदाहरण देते हुए कहा कि उभरती और मध्यम शक्तियां बड़ी शक्तियों के साथ भी सहयोग कर सकती हैं। संपर्क सुविधा के क्षेत्र में उन्होंने भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC), अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) और उत्तरी समुद्री मार्ग का उल्लेख किया। उन्होंने ब्रिक्स को भी ऐसा मंच बताया, जहां विभिन्न देश सामूहिक आवाज के माध्यम से अपनी बात को अधिक प्रभावी ढंग से सामने रखते हैं।
उन्होंने कहा कि आपूर्ति श्रृंखला को अधिक मजबूत और लचीला बनाना अब केवल आर्थिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक स्थिरता से भी जुड़ गया है। वैश्विक स्तर पर बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच देशों की प्राथमिकता जोखिम कम करने और आवश्यक वस्तुओं, प्रौद्योगिकी तथा व्यापारिक मार्गों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था तैयार करने की है।
म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन से जुड़े संवाद में विदेश मंत्री ने भारत की आर्थिक संभावनाओं पर भी बात की। उन्होंने कहा कि आने वाले दशक में भारत की आर्थिक वृद्धि तेज रहने की संभावना है और देश की जनांकिकीय स्थिति भी विकास के लिए अनुकूल आधार प्रदान करती है। उनके अनुसार भारत अब यूरोप के साथ अपने संबंधों को पारंपरिक द्विपक्षीय संबंधों से आगे बढ़ाकर यूरोपीय संघ के साथ व्यापक साझेदारी की दिशा में ले जा रहा है।
डॉ. जयशंकर ने उन्नत विनिर्माण, सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अंतरिक्ष क्षमताओं को भारत और यूरोपीय संघ के बीच सहयोग के महत्वपूर्ण क्षेत्र बताया। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय रक्षा क्षेत्र के स्टार्टअप अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साझेदारियां बढ़ा रहे हैं और भारत का रक्षा निर्यात भी तेजी से विस्तार कर रहा है।

विदेश मंत्री के अनुसार, बदलती वैश्विक परिस्थितियों में भारत का दृष्टिकोण विभिन्न देशों और समूहों के साथ अपने हितों के अनुरूप सहयोग बढ़ाने का है। उन्होंने कहा कि लचीली साझेदारियां, आपूर्ति श्रृंखला में विविधता और साझा हितों पर आधारित सहयोग आने वाले समय में वैश्विक व्यवस्था की महत्वपूर्ण विशेषताएं होंगी।
