नई दिल्ली, 26 अगस्त 2026। भारत ने नस्लीय भेदभाव के उन्मूलन पर संयुक्त राष्ट्र समिति (यूएनसीईआरडी) की हालिया टिप्पणियों को कड़े शब्दों में खारिज करते हुए इन्हें राजनीतिक रूप से प्रेरित और अत्यंत दुर्भावनापूर्ण बताया है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारत ने समिति की समीक्षा प्रक्रिया में रचनात्मक भावना के साथ भाग लिया, लेकिन रिपोर्ट में किए गए व्यापक सामान्यीकरण और अप्रमाणित आरोपों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने 26 अगस्त को मीडिया के सवालों के जवाब में कहा कि भारत ने नस्लीय भेदभाव के सभी रूपों से निपटने की अपनी प्रतिबद्धता को समीक्षा के दौरान दोहराया। उन्होंने कहा कि भारत ने 1960 के दशक में नस्लीय भेदभाव के उन्मूलन पर अंतरराष्ट्रीय संधि यानी आईसीईआरडी के वार्ता और मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया में अग्रणी भूमिका निभाई थी। भारत का इस मुद्दे पर रुख लंबे समय से स्पष्ट और प्रतिबद्ध रहा है।
भारत की 11वीं आवधिक समीक्षा जिनेवा में 11 और 12 अगस्त को हुई थी। इस दौरान भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने देश के संवैधानिक सुरक्षा उपायों, मजबूत कानूनी ढांचे, बहुलतावादी चरित्र, सकारात्मक कार्रवाई, लोकतांत्रिक जवाबदेही और न्यायिक उपायों के साथ-साथ वंचित समुदायों के संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयासों को सामने रखा। भारत ने कहा कि समानता, गरिमा और अवसर सुनिश्चित करने के लिए देश में व्यापक संवैधानिक और संस्थागत व्यवस्था मौजूद है।
विदेश मंत्रालय के अनुसार, समीक्षा बैठक के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के नेतृत्व वाले अंतर-मंत्रालयी प्रतिनिधिमंडल ने समिति की ओर से किए गए व्यापक सामान्यीकरण और अप्रमाणित आरोपों पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। भारतीय पक्ष ने यह भी कहा कि कुछ टिप्पणियां उस संधि के दायरे से आगे जाती हैं, जिसके तहत समिति भारत की समीक्षा कर रही थी।
संयुक्त राष्ट्र की समिति ने अपनी टिप्पणियों में भारत में कुछ वंचित और अल्पसंख्यक समुदायों से जुड़े कथित भेदभाव तथा कानून-प्रवर्तन से संबंधित चिंताओं का उल्लेख किया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार समिति ने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, कुछ जातीय एवं धार्मिक समुदायों, रोहिंग्या, प्रवासियों और शरण चाहने वालों से जुड़े मुद्दे उठाए हैं। असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के क्रियान्वयन और कुछ क्षेत्रों में बंगाली भाषी मुस्लिम समुदाय से जुड़े मुद्दों पर भी समिति ने चिंता व्यक्त की।
भारत ने इन टिप्पणियों के जवाब में अपनी संवैधानिक व्यवस्था और कानूनी संरक्षण को रेखांकित किया है। सरकार का कहना है कि देश में सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित वर्गों के लिए विभिन्न संवैधानिक प्रावधान, आरक्षण व्यवस्था, न्यायिक उपचार और लक्षित सार्वजनिक नीतियां लागू हैं। भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह अंतरराष्ट्रीय संधि निकायों के साथ संवाद और निर्धारित प्रक्रियाओं के तहत सहभागिता जारी रखेगा।
रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत समिति की टिप्पणियों का जवाब स्थापित प्रक्रिया के तहत देगा। उन्होंने यह भी बताया कि जिनेवा स्थित भारतीय मिशन की ओर से समीक्षा के बाद विस्तृत प्रेस विज्ञप्ति पहले ही जारी की जा चुकी है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ रचनात्मक संवाद के प्रति भारत की प्रतिबद्धता बनी रहेगी, लेकिन देश के खिलाफ राजनीतिक उद्देश्य से की गई या दुर्भावनापूर्ण टिप्पणियों को स्वीकार नहीं किया जाएगा।

भारत का यह रुख ऐसे समय सामने आया है जब संयुक्त राष्ट्र समिति की टिप्पणियों को लेकर देश में बहस तेज हुई है। सरकार ने एक ओर नस्लीय भेदभाव के खिलाफ अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है, वहीं दूसरी ओर समिति की रिपोर्ट में भारत से संबंधित कुछ निष्कर्षों की पद्धति और दायरे पर गंभीर आपत्ति जताई है।
