दुर्ग। छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक परंपराओं में चीला तिहार का विशेष स्थान है। हरेली पर्व के बाद मनाए जाने वाले इस पारंपरिक उत्सव की झलक दुर्ग जिले के ग्राम पाउवारा में देखने को मिली, जहां रविवार को ‘इतवारी चीला तिहार’ महोत्सव का आयोजन किया गया।
शासकीय विद्यालय परिसर में आयोजित इस महोत्सव में छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति, ग्रामीण जीवनशैली और पारंपरिक खान-पान के रंग देखने को मिले। कार्यक्रम में लोक नृत्य और संगीत की प्रस्तुतियों ने माहौल को उत्सवमय बना दिया। महिलाओं ने फुगड़ी सहित विभिन्न पारंपरिक गतिविधियों में उत्साह के साथ भाग लिया।
महोत्सव में बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों के लिए विभिन्न ग्रामीण खेल एवं प्रतियोगिताएं भी आयोजित की गईं। कुर्सी दौड़, नारियल फेंक सहित कई खेलों में ग्रामीणों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। ग्राम पाउवारा के साथ आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में लोग आयोजन में शामिल हुए।

कार्यक्रम में दुर्ग के पूर्व विधायक अरुण वोरा सहित कई जनप्रतिनिधि और ग्रामीण मौजूद रहे। अरुण वोरा ने आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने का माध्यम बनते हैं। साथ ही इससे ग्रामीणों के बीच आपसी मेल-जोल और सामाजिक एकता को भी बढ़ावा मिलता है।
महोत्सव के संयोजक हर्ष साहू ने बताया कि ‘इतवारी चीला तिहार’ का उद्देश्य धीरे-धीरे विलुप्त होती पारंपरिक परंपराओं और ग्रामीण उत्सवों को जीवंत बनाए रखना है। इसके साथ ही आसपास के गांवों को एक मंच पर लाकर भाईचारे और सामाजिक एकजुटता को मजबूत करना भी आयोजन का प्रमुख उद्देश्य है।
पारंपरिक व्यंजनों ने बढ़ाई महोत्सव की रौनक
आयोजन में छत्तीसगढ़ी पारंपरिक व्यंजनों की प्रदर्शनी भी लगाई गई। चीला, खुरमी, ठेठरी, फरा सहित कई स्थानीय व्यंजन लोगों के आकर्षण का केंद्र रहे। ग्रामीणों ने इन पारंपरिक पकवानों का स्वाद लिया और इनके महत्व के बारे में भी जानकारी प्राप्त की।
महोत्सव के समापन पर विभिन्न खेलों और प्रतियोगिताओं के विजेताओं को अतिथियों द्वारा सम्मानित किया गया। ‘इतवारी चीला तिहार’ ने ग्रामीणों को मनोरंजन के साथ अपनी संस्कृति, परंपराओं और पारंपरिक खान-पान से जुड़ने का अवसर दिया। आयोजन ने यह संदेश भी दिया कि लोक परंपराओं को सहेजकर ही उन्हें आने वाली पीढ़ियों तक प्रभावी रूप से पहुंचाया जा सकता है।
