नई दिल्ली, 6 नवंबर 2026। देश में नागरिकों के मौलिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने के बाद 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की संवैधानिक समय-सीमा पुलिस द्वारा गिरफ्तारी की औपचारिक कार्रवाई दर्ज किए जाने के समय से नहीं, बल्कि उस क्षण से शुरू होगी, जब व्यक्ति की स्वतंत्रता वास्तव में छीन ली जाती है और उसे हिरासत में लिया जाता है। इस फैसले से पुलिस और जांच एजेंसियों द्वारा तलाशी, पूछताछ अथवा जांच के नाम पर किसी व्यक्ति को लंबे समय तक हिरासत में रखने और बाद में गिरफ्तारी दर्ज करने की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी।
न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 22(2) की व्याख्या करते हुए कहा कि गिरफ्तारी और हिरासत के बीच कृत्रिम अंतर पैदा करके संवैधानिक सुरक्षा को निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता। संविधान के अनुसार गिरफ्तार और हिरासत में रखे गए व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करना अनिवार्य है। इस अवधि की गणना में केवल गिरफ्तारी स्थल से मजिस्ट्रेट की अदालत तक पहुंचने में लगने वाला आवश्यक यात्रा समय ही बाहर रखा जा सकता है।
तलाशी और पूछताछ के नाम पर नहीं चलेगी मनमानी
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि तलाशी और जब्ती की कार्रवाई पूरी होने या गिरफ्तारी का औपचारिक मेमो तैयार होने तक की अवधि को 24 घंटे की गणना से बाहर नहीं रखा जा सकता। यदि किसी व्यक्ति को जांच एजेंसी अपने नियंत्रण में लेकर उसकी आवाजाही और स्वतंत्रता सीमित कर देती है, तो उसी समय से संवैधानिक समय-सीमा शुरू हो जाएगी।
पीठ ने कहा कि जांच के नाम पर ऐसी कोई अंतरिम अवधि नहीं बनाई जा सकती, जिसमें व्यक्ति की स्वतंत्रता छीन ली जाए, लेकिन उसे कानूनी रूप से गिरफ्तार नहीं दिखाया जाए। ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 22(2) की भावना और प्रावधानों के विरुद्ध है।
24 घंटे से अधिक हिरासत पर तत्काल रिहाई का प्रावधान
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति को आवश्यक यात्रा समय को छोड़कर 24 घंटे से अधिक समय तक मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए बिना हिरासत में रखा जाता है, तो उसे तत्काल रिहा किया जाना चाहिए। इसके साथ ही अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 58 का उल्लेख करते हुए कहा कि हिरासत की अवधि 24 घंटे के भीतर भी परिस्थितियों के अनुसार उचित और आवश्यक होनी चाहिए।
मजिस्ट्रेट की जिम्मेदारी होगी कि वह आरोपी को पेश किए जाने पर हिरासत में लिए जाने की वास्तविक तारीख और समय दर्ज करे तथा यह जांच करे कि संवैधानिक समय-सीमा का पालन हुआ है या नहीं। यदि हिरासत की अवधि परिस्थितियों के हिसाब से अनुचित रूप से लंबी पाई जाती है, तो मजिस्ट्रेट रिमांड देने से इनकार भी कर सकता है।
चार आरोपियों की अपील पर आया फैसला
यह फैसला एनडीपीएस अधिनियम के तहत दर्ज मादक पदार्थ तस्करी के एक मामले में चार आरोपियों की अपील पर आया। आरोपियों को 29 सितंबर 2025 को दोपहर लगभग दो बजे तलाशी और जब्ती की कार्रवाई के दौरान हिरासत में लिया गया था, जबकि उनकी औपचारिक गिरफ्तारी अगले दिन दर्ज की गई। उन्हें 30 सितंबर को शाम 4 बजकर 45 मिनट पर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि निर्धारित समय-सीमा का उल्लंघन हुआ है और उनकी हिरासत असंवैधानिक थी। अदालत ने उन्हें सात दिनों के भीतर संबंधित विशेष अदालत में पेश करने तथा इसके बाद उचित शर्तों पर जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया।
उच्च न्यायालयों के पूर्व विचारों से असहमति
शीर्ष अदालत ने ओडिशा उच्च न्यायालय के आर्यमान पटनायक मामले, मद्रास उच्च न्यायालय के कन्नन मामले और केरल उच्च न्यायालय के अरुण के. थॉमस मामले में व्यक्त उन विचारों से असहमति जताई, जिनमें औपचारिक गिरफ्तारी से पहले की हिरासत को 24 घंटे की गणना से बाहर रखने की अनुमति दी गई थी।
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले की प्रति सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के पुलिस महानिदेशकों, उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरलों तथा राज्य न्यायिक अकादमियों के निदेशकों को भेजने का निर्देश भी दिया है।

यह निर्णय नागरिकों के मौलिक अधिकारों, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निष्पक्ष जांच व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे जांच एजेंसियों को स्पष्ट संदेश मिला है कि कानून की प्रक्रिया के नाम पर किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को मनमाने ढंग से सीमित नहीं किया जा सकता।
