धनतेरस पर जगमगाए छत्तीसगढ़ के बाजार, धन-आरोग्य और समृद्धि की कामना के साथ दीपावली उत्सव का शुभारंभ

रायपुर, 6 नवंबर 2026। देशभर में आज शुक्रवार को धनतेरस का पर्व श्रद्धा, उल्लास और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। पांच दिवसीय दीपावली उत्सव का शुभारंभ करने वाला यह पर्व धन, आरोग्य, सुख-समृद्धि और मंगलकामना का प्रतीक है। सुबह से ही देश के विभिन्न शहरों में बाजारों में चहल-पहल बढ़ गई है। छत्तीसगढ़ में भी धनतेरस को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिल रहा है। राजधानी रायपुर सहित प्रदेश के विभिन्न शहरों और कस्बों में बाजार आकर्षक रोशनी, रंग-बिरंगी सजावट और दीपावली की रौनक से जगमगा उठे हैं।

धनतेरस को धनत्रयोदशी के नाम से भी जाना जाता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इसलिए इस दिन भगवान धन्वंतरि की विशेष पूजा की जाती है। उन्हें आयुर्वेद और आरोग्य का देवता माना जाता है। इस अवसर पर माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की आराधना कर परिवार में सुख, शांति, उत्तम स्वास्थ्य और आर्थिक समृद्धि की कामना की जाती है।

छत्तीसगढ़ के बाजारों में खरीदारी की धूम

धनतेरस के अवसर पर छत्तीसगढ़ के बाजारों में विशेष रौनक है। राजधानी रायपुर के सदर बाजार, सराफा बाजार, गोल बाजार, मालवीय रोड, पंडरी, शंकर नगर, लाखे नगर और पुरानी बस्ती सहित प्रमुख व्यावसायिक क्षेत्रों में ग्राहकों की आवाजाही बढ़ी है। आभूषण, बर्तन, इलेक्ट्रॉनिक सामान, वाहन, घरेलू उपयोग की वस्तुओं, मिठाइयों और सजावटी सामग्री की दुकानों पर खरीदार पहुंच रहे हैं। दुकानदारों ने भी आकर्षक रोशनी और विशेष सजावट के साथ ग्राहकों के स्वागत की तैयारी की है।

सोने-चांदी के आभूषण, सिक्के, पीतल, तांबे और कांसे के बर्तन खरीदने की परंपरा धनतेरस से जुड़ी हुई है। इसके साथ ही वाहन, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, झाड़ू और मिट्टी के दीपक खरीदना भी शुभ माना जाता है। रायपुर के अलावा बिलासपुर, दुर्ग, भिलाई, राजनांदगांव, जगदलपुर, अंबिकापुर और अन्य शहरों में भी बाजारों में त्योहारी उत्साह दिखाई दे रहा है।

छत्तीसगढ़ की लोकपरंपराओं में भी धनतेरस का विशेष स्थान

छत्तीसगढ़ में दीपावली को स्थानीय लोकभाषा में देवारी तिहार और सुरहुत्ती तिहार के नाम से भी जाना जाता है। यहां धनतेरस केवल खरीदारी का पर्व नहीं, बल्कि कृषि संस्कृति, प्रकृति और लोकजीवन से जुड़ी परंपराओं का भी प्रतीक है। ग्रामीण अंचलों में नई फसल के धान की बालियों से बनी सुतली या सूता की माला घरों के मुख्य द्वार पर बांधने की परंपरा है। इसे अन्न, खुशहाली और समृद्धि के स्वागत का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि आंगन में आने वाले पक्षियों के धान चुगने से घर में सुख-समृद्धि का संदेश आता है।

माता लक्ष्मी के स्वागत के लिए घरों की साफ-सफाई, मुख्य द्वार पर रंगोली, बंदनवार और दीप सजाने की परंपरा भी निभाई जाती है। कई परिवारों में नई झाड़ू की पूजा की जाती है। व्यापारी वर्ग अपने प्रतिष्ठानों में धनतेरस के अवसर पर पूजा-अर्चना कर नए बही-खातों और कारोबार में उन्नति की कामना करता है।

यम दीपदान से जुड़ी है विशेष मान्यता

धनतेरस की संध्या पर भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा के साथ यमराज के निमित्त दीपदान करने की परंपरा भी है। इसे यम दीपदान कहा जाता है। घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर दीप प्रज्वलित कर परिवार की सुख-समृद्धि और दीर्घायु की प्रार्थना की जाती है।

इस वर्ष रायपुर में धनतेरस की पूजा के लिए शाम 5 बजकर 57 मिनट से 7 बजकर 56 मिनट तक का शुभ मुहूर्त निर्धारित है। वहीं प्रदोष काल शाम 5 बजकर 25 मिनट से 7 बजकर 58 मिनट तक रहेगा।

धनतेरस का संदेश केवल धन-संपत्ति अर्जित करने तक सीमित नहीं है। यह पर्व स्वस्थ जीवन, परिश्रम, स्वच्छता, पारिवारिक मंगल और सामाजिक समृद्धि के महत्व को भी रेखांकित करता है। दीपों के इस महापर्व की शुरुआत के साथ ही घर-आंगन से लेकर बाजारों तक उत्सव का वातावरण बन गया है। अब सभी को दीपावली के मुख्य पर्व और मां लक्ष्मी के स्वागत की प्रतीक्षा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *